मंदिर में बहुत भीड़ थी। एक युवक, मोहन, मंदिर में दर्शन करने गया था। वहाँ उसे मंदिर की सीढ़ियों के पास कुछ पैसे बिखरे दिखे। पास जाकर देखा तो पता चला कि किसी के पैसे गिर गए हैं। मोहन ने पैसे उठाए। उसके दोस्त ने कहा, "मोहन, पैसे मिल गए हैं। इन्हें रख लो या मंदिर के चढ़ावे में डाल दो।" लेकिन मोहन ने सोचा — यह पैसा किसी का खोया हुआ है।
मोहन ने कहा, "यह पैसा किसी का है, जो पूजा करने आया होगा और गिरा दिया होगा। मुझे उसका मालिक ढूँढ़ना है। खोए हुए पैसे ढूँढ़ने पर ईमानदारी सबसे ज़रूरी है।" मोहन ने पैसे लेकर मंदिर के पुजारी से कहा, "पुजारी जी, यह पैसे किसी के गिर गए हैं। कृपया घोषणा कीजिए, ताकि मालिक मिल सके।" पुजारी ने घोषणा की।
थोड़ी देर बाद एक गरीब महिला आई और रोते हुए बोली, "मेरे 1000 रुपये गिर गए हैं, जो मैं चढ़ावा देने के लिए लाई थी। किसी को मिले हैं?" मोहन ने पुजारी से पूछा और पक्का करके महिला को पैसे लौटा दिए। महिला बहुत खुश हुई और बोली, "बेटा, तुमने मेरे पैसे लौटाए। मैं बहुत गरीब हूँ, ये पैसे मेरी बहुत मेहनत की कमाई थे। भगवान तुम्हें आशीर्वाद दें।"
पुजारी ने मोहन की ईमानदारी देखी और मंदिर में मौजूद लोगों से कहा, "इस युवक ने खोए हुए पैसे लौटाए। यही तो सच्ची ईमानदारी है।" सबने मोहन की तारीफ़ की। मोहन के माता-पिता को अपने बेटे पर बहुत गर्व हुआ। मोहन की माँ ने कहा, "बेटा, तुमने हमारा नाम रोशन किया। ईमानदारी ही असली धन है और तुमने वह कमाया है।" मोहन के पिता ने कहा, "बेटा, याद रखना — चाहे कितनी भी गरीबी हो, किसी का पैसा कभी मत रखना। आज तुमने यही सीख दी है।"
मोहन की इस ईमानदारी की चर्चा पूरे गाँव में हुई। गाँव के मुखिया ने मोहन को सम्मानित किया और बाकी बच्चों के सामने उसकी मिसाल दी। कई सालों बाद मोहन ने अपने बेटे से कहा, "बेटा, मैंने अपने जीवन में एक बार मंदिर में किसी के गिरे पैसे पाए थे। मैंने उन्हें मालिक को लौटाया। याद रखना — खोए हुए पैसे ढूँढ़ने पर ईमानदारी सबसे ज़रूरी है। किसी का पैसा रख लेना चोरी है। भगवान ईमानदार लोगों पर कृपा करते हैं और उनका सम्मान हर जगह होता है।"
मोहन का बेटा, अरविंद, बड़ा होकर एक दिन मंदिर में दर्शन करने गया। वहाँ उसे सीढ़ियों के पास कुछ पैसे बिखरे दिखे। अरविंद का मन ललचाया, लेकिन उसे अपने पिता की कहानी याद आई — कैसे मोहन ने मंदिर में मिले पैसे पुजारी के पास दिए और मालिक को लौटाए। अरविंद ने पैसे उठाए और पुजारी से कहा, "पुजारी जी, यह पैसे किसी के गिरे हैं। कृपया घोषणा कीजिए।"
पुजारी ने घोषणा की और थोड़ी देर बाद एक गरीब महिला आई जिसके पैसे खो गए थे। अरविंद ने पक्का करके महिला को पैसे लौटा दिए। महिला ने अरविंद का धन्यवाद किया और कहा, "बेटा, तुम्हारे पिता की तरह तुम भी ईमानदार हो।" अरविंद ने अपने पिता को बताया और मोहन ने कहा, "बेटा, तुमने सही किया। यही तो खोए हुए पैसे ढूँढ़ने पर ईमानदारी है — वह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है।"
पुजारी ने मंदिर में अरविंद की तारीफ़ की। अरविंद ने अपने बेटे से कहा, "बेटा, याद रखना — खोए हुए पैसे ढूँढ़ने पर ईमानदारी सबसे ज़रूरी है। किसी का पैसा रख लेना चोरी है। भगवान ईमानदार लोगों पर कृपा करते हैं और उनका सम्मान हर जगह होता है।"